प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन: क्या है साम्राज्यवादी, राष्ट्रवादी और मार्क्सवादी विचारधाराओं का सच?

नमस्ते दोस्तों हमने पिछली पोस्ट में यह देखा था कि इतिहास होता क्या है इतिहास को कैसे बनाया जाता है उसमें किस प्रकार की किस आधार पर इतिहास लिखा जाता है स्रोत क्या-क्या होते हैं उसकी बात कैसे-कैसे किया जाता है यानी यह सब हमने चर्चाएं कर ली थी पिछली पोस्ट में तो अब इस पोस्ट में चर्चा करेंगे कि इतिहास किन-किन विचारधाराओं पर लिखा जाता है कि इतिहास भी अलग-अलग विचारधाराओं की मत होती है उन विचारधाराओं के आधार पर इतिहास कैसे लिखा जाता है इस बारे में चर्चा करेंगे जैसे कि हम जानते हैं कि साम्राज्यवादी विचारधारा होती है राष्ट्रवादी विचारधारा होती है

 मार्क्सवादी विचारधारा होती है इस प्रकार की जो विचारधाराएं होती हैं यह अपना मत क्या कहते हैं जो भारत के इतिहास को लिखते समय इसमें क्या-क्या उनकी राय होती है हालांकि हम इसे प्राचीन इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे तो इन लोगों का मत क्या है किस आधार पर अपने मत को प्राचीन इतिहास को समझाया है लिखा है बताया है कि उनके अलग-अलग मत क्या हैं चर्चा करेंगे कि मार्क्सवादी विचारधारा के लोग क्या सोच के हमारे प्राचीन इतिहास के बारे में लिखा है 

राष्ट्रवादी विचारधारा के जो इतिहासकार हैं वह सोचकर हमारे प्राचीन इतिहास के बारे में क्या लिखा है मार्क्सवादी विचारधारा के जो इतिहासकार हैं उन्होंने क्या लिखा है इन सभी के बारे में चर्चा करेंगे और सब के बारे में एक-एक करके हम जानेंगे कि हालांकि यह लोग होते कौन हैं कैसे करते हैं उनकी सोच क्या है इसके आधार पर किस तरह से प्रेरित हैं स्रोत कहां से उठाते हैं यह तमाम जो प्रश्न आ रहे हैं उसको हम एक-एक करके समझने की कोशिश करेंगे ठीक है तो चलिए बात करते हैं पहले हमारी साम्राज्यवादी विचारधारा



हमारी साम्राज्यवादी विचारधारा

इसके तहत जो इतिहासकार होते हैं वह ब्रिटिश साम्राज्य के हित में रखकर इतिहास लिखते हैं यानी उन्होंने इतिहास की उपलब्ध स्रोत की निष्पक्ष व्याख्या करके नहीं लिखा ब्रिटिश साम्राज्य के हित को ध्यान में रखते हुए इतिहास लेखन का मुख्य बिंदु बताते हैं जो इस प्रकार है

उन्होंने दिखाया है कि आर्य विदेशी थे और इस तरह से उन्होंने भारत में आर्य बनाम अनार्य का समीकरण बना दिया है और साथ ही साथ विदेशी होने के योग्यता के भाव से भी मुक्त कर दिया यानी कि उन्होंने आर्य को खास तौर पर भारत के ना बताकर विदेशी को बताया है और उन्होंने अनार्य बनाम आर्य को एक समीकरण बनाकर उन्होंने यह साबित किया है कि जो यह लोग थे वह विदेशी थे

भारत को रिक्त दिखाया यानी कि संस्कृति विज्ञान प्रौद्योगिकी आर्थिक उन्नति राज्य और प्रशासन का विकास आदि सभी मोर्चों पर उन्होंने भारत को पीछे दिखाया है उन्होंने भारतीय समाज को स्त्री और पिछड़ी जाति का शोषण बताया

उन्होंने बाद के काल की प्राप्त कुछ उपलब्धियों को स्वीकार तो किया है लेकिन उनकी व्याख्या उन्होंने इस तरह से की है कि वह उपलब्धियां विदेशी संपर्क प्रेरणा संपर्क और प्रेरणा के प्रतिफल नजर आएं जैसे कि अजंता की पेंटिंग उन्होंने बताया कि जो अजंता की पेंटिंग है वह रोमन चित्रकला से प्रेरित थी

भारत की मूर्ति कला गंधार की मूर्ति कला से प्रेरित है और गंधार की मूर्ति कला ग्रीक और रोमन से प्रेरित है यह अशोक के स्तंभ ईरानी स्तंभों की अनुकरण हैं यह कौटिल्य के अर्थशास्त्र को ग्रीक राजनीतिक विचार और व्यवस्था की प्रेरणा से प्रेरित किया यह सिंधु घाटी सभ्यता को मेसोपोटामिया से प्रेरित बताए थे इन्होंने साम्राज्य के विघटन के काल को अंधकार युग के रूप में दिखाया जैसे कि उत्तर गुप्त काल और गुप्त के उत्तर काल



राष्ट्रवादी इतिहास लेखक या राष्ट्रवादी विचारधारा 

के लेखक इसके तहत इतिहासकार इस कालखंड को उपलब्धियों से परिपूर्ण दिखाया जाता है और इन उपलब्धियों को मौलिक बताया जाता है एवं भारत को विश्व को ज्ञान फैलाने वाले के रूप में इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि कुछ राष्ट्रवादी आर्यों को विदेशी मानने के लिए तैयार नहीं थे लेकिन राष्ट्रवादियों का एक वर्ग इसे मानता है

 आरंभ में राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने क्षेत्रीय राज्यों के उदय को अंधकार के काल के रूप में स्वीकार कर लिया था राष्ट्रवादी इतिहास लेखन साम्राज्यवादी इतिहास लेखन की तुलना में वह ज्यादा गहन और गंभीर है इसमें इतिहासकारों की शोध प्रकृति दृष्टि की सराहना करते हैं 

उनकी आलोचना भी करते हैं तो इसके तहत हम राजेंद्र लाल मित्र लाला भंडारकर आर सी मजूमदार यह तमाम प्रकार के जो इतिहासकार हैं वह राष्ट्रवादी इतिहासकार हैं राष्ट्रवादी साहित्य कला प्रेस शिक्षा संस्थान के साथ ही राष्ट्रवादी इतिहास लेखन भी विकसित हुआ है मजूमदार के इतिहास संबंधी शोध कार्य के लिए तो राजेंद्र प्रसाद ने धन इकट्ठा करने में योगदान दिए थे स्वदेशी आंदोलन में राष्ट्रीय गौरव का जो भाव पैदा किया वह राष्ट्रवादी इतिहास लेखन में दिखता है अंग्रेज यह कहा करते थे कि भारतीय लोगों ने प्राचीन काल में राज्य संबंधित सिद्धांतों संस्थाओं का विकास नहीं किया था वह जनता के प्रतिनिधित्व पर आधारित स्वशासन में विश्वास नहीं रखते थे

 इसके जवाब में 1920 से 30 के बीच कई तरह के शोध पत्र तैयार हुए जो प्राचीन कालीन भारतीय राजनीतिक विचार और संस्थाओं के विकास पर आधारित थे इनमें से सबसे प्रसिद्ध पुस्तक के पी जायसवाल की हिंदू पॉलिटी थी अनेक इतिहासकारों ने भारत के गणतंत्र और स्थानीय स्वशासन एवं सामाजिक समझौता पर आधारित राज्य व्यवस्था के विचार के माध्यम से यह दिखाया है कि भारत में राजनीतिक विचार और संस्थाएं लोकतंत्र सब मौजूद था भारत को लोकतंत्र की जननी की तरह प्रस्तुत किया गया 

रमेश चंद्र मजूमदार ने धार्मिक साहित्य के आधार पर शतपथ ब्राह्मण के उदाहरण से सामाजिक समझौता का विचार दिखाया शतपथ ब्राह्मण के उदाहरण के माध्यम से अराजकता के सिद्धांत के आधार पर राज्य की आवश्यकता और औचित्य के वैचारिक आधार को प्रमाणिकता दी इस दौर में उन्होंने इतिहासकारों ने बौद्ध धर्म से संबंध और लोकतांत्रिक आदर्श एवं विश्व के बौद्धिक विकास में उनका योगदान रेखांकित किया गया

 राजनीतिक लोकोपकारिता उच्च आदर्श वैज्ञानिक नीति युद्ध और शांति तक के नैतिक नियम आदि के माध्यम से भारतीयों की राजनीतिक दृष्टि की गहनता और श्रेष्ठता को सिद्ध किया गया है

इस प्रकार की उपलब्धियां आर्थिक वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी औद्योगिकी एवं व्यापारिक क्षेत्र में भी दिखाई गई हैं इसके तहत रोमन स्रोतों से प्रमाण जुटाकर यह सिद्ध किया गया है कि भारत और रोम में होने वाले व्यापार में व्यापार का संतुलन भारत के पक्ष में था जिससे भारत के उद्योग और प्रौद्योगिकी की श्रेष्ठता भी सिद्ध होती है राष्ट्रवादियों ने शुल्ब सूत्रों से लेकर भास्कराचार्य की लीलावती तक गणित की पुस्तकों से भारतीयों के गणित ज्ञान का प्रमाण दिया आर्यभट्ट और ब्रह्मगुप्त के माध्यम से खगोल संबंधित अनुसंधान और अध्ययन को प्रमाणित किया और इसी तरह का प्रमाण आयुर्वेद के संबंध में दिया मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि साम्राज्यवादी लेखन के प्राचीन काल में जहां अंधकार का युग नजर आता है वहीं राष्ट्रवादी लेखन में यह काल उपलब्धियों से परिपूर्ण नजर आता है उन्होंने जो इतिहास लिखा है उसकी कुछ सीमाएं के अंदर उन्होंने लिखा चलिए सीमाओं पर चर्चा करते हैं कि कौन-कौन सी हैं

जैसे कि उपलब्धियों की ओर संकेत करने वाले प्रमाणों की समीक्षा पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया मजूमदार जैसे इतिहासकार ने क्षेत्रीय ब्राह्मण ग्रंथों में देवताओं द्वारा युद्ध और देवताओं के द्वारा इंद्र को अपने राजा चुनने की कथा के आधार पर अलौकिक सामाजिक संविदा के विचार को उस प्राचीन काल में उपस्थित बताया

उनके लेखन में संस्कृतियों के विकास में अन्य संस्कृति और संपर्क के लाभ के विचार को स्वीकार किया और इनके तहत मौलिक विकास और विश्व में योगदान को दिखाने पर विशेष बल दिया तात्पर्य यह नहीं है कि प्राचीन काल में मौलिकता की कमी थी या फिर विश्व में उनका योगदान बड़ा नहीं था मूल बात यह है कि उन्होंने मौलिकता पर आधारित अत्यधिक बल दिया जो संस्कृति के जटिल विकास को कई बार सरलीकृत रूप में प्रस्तुत करती है

इसके तहत भारतीय समाज के अंतर्विरोध और शोषण एवं दमन को प्रायः नजर अंदाज किया गया था इस तरह से महिलाओं और शूद्रों की विशेषताओं और दासों आदि के जीवन पर कम लिखा गया है इतिहास सामान्यतः राजनीतिक उत्थान और पतन आर्थिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों के ही केंद्रित रहा

राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने भी साम्राज्य के विघटन को वैसे ही पतन का प्रमाण बताया है जैसे कि साम्राज्यवादियों ने माना था बल्कि हम कह सकते हैं कि उनके इतिहास लेखन में राष्ट्रवादी गौरव का भाव और राष्ट्रीय एकता की चेतना राष्ट्रवादी भावनाओं से प्रेरित होकर शामिल हुई थी लेकिन इस क्रम में कुछ सीमाओं के बावजूद यह कहा जा सकता है कि प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन में पहला गंभीर शोध और व्यावसायिक दृष्टि से समृद्ध इतिहास लेखन इसी काल में आरंभ हुआ था


मार्क्सवादी इतिहास लेखन या मार्क्सवादी विचारधारा के लेखक

इसका अर्थ है कि ऐसे इतिहास जो मार्क्स की इतिहास समझ से प्रेरित हैं जो मार्क्स की विचारधाराओं में चलते हैं मार्क्स एक गहन इतिहासकार राजनीतिक शास्त्र का ज्ञान रखने वाला अध्ययन करने वाला राजनीतिज्ञ था इतिहासकार था उसकी विचारधाराओं पर लोग चलते हैं 

जैसे कि आर एस शर्मा डी एन झा यह तमाम प्रकार के इतिहासकार मार्क्सवादी हैं इतिहासकारों ने मार्क्स के विचार से प्रेरित होकर यह विचार अपनाया कि किसी भी देश में मूल निर्धारक शक्ति होती है और अधिरचना उस पर आधारित होती है आधार अर्थव्यवस्था को माना जाता है और अर्थव्यवस्था को ही समाज संस्कृति राजनीति आदि का निर्धारक माना जाता है यानी कि उनके ख्याल से अर्थव्यवस्था में परिवर्तन होने के बाद ही किसी नए युग का सूत्रपात होता है और यह परिवर्तन ही किसी भौतिक शक्ति का ही नाम होता है जैसे कि

उनके ख्याल में ऋग्वेद का समाज जनजातीय था एवं उनकी राजनीति कबीलाई थी क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था पशुपालन पर आधारित थी

उत्तर वैदिक काल में स्थिर ग्रामीण जीवन आया कुछ हद तक शक्तिशाली हो गए राजा जैसे क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था कृषि पर आ गई

छठी शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान बौद्धिक आंदोलन हुआ दूसरी नगरीय क्रांति हुई एवं महाजनपद की राजनीति का उभार हुआ क्योंकि कृषि उद्योग और व्यापार के माध्यम से अर्थव्यवस्था में वृद्धि हुई और अर्थव्यवस्था के विकास के पीछे का मूल आधार यह था कि उस युग में लोहे का प्रयोग बढ़ा हुआ था

मार्क्स की विचारधारा से प्रभावित होकर यह विचार दिए गए कि समाज में आर्थिक संसाधनों के स्वामी का ही प्रभुत्व होगा और इस आधार पर उन्होंने समाज को दो वर्गों में बांटा और भूमि स्वामी और सर्वहारा मजदूरों द्वारा विभाजित करते हैं

यह दो वर्गों में बांटकर देखते हैं उच्च वर्ग और निम्न वर्ग की बात ही नहीं करते मार्क्सवादी विचारधारा ऐतिहासिक भौतिकवाद पर विश्वास करती है जिसका यह कहना है कि मानव सभ्यता का विकास विविध चरणों से गुजरकर हुआ जैसे कि आदिम साम्यवाद दास आधारित उत्पादन प्रणाली सामंती प्रणाली पूंजीवादी प्रणाली साम्यवादी प्रणाली

मार्क्सवाद की मान्यता यह है कि एक दिन पूरी दुनिया में एक दिन साम्यवाद आएगा अपनी इस समानता को मार्क्स ने वैज्ञानिक करार दिया और वैज्ञानिकता का आधार इतिहास के विकास क्रम की अपनी समझ को बताया इसी आधार पर मार्क्सवादी इतिहासकार भी भविष्य में साम्यवाद की संभावना को समाज में स्थापित करने के लिए समर्पित हैं इतिहास के विकास के इस क्रम को सही मानते हैं 

इसी वजह से मार्क्सवादी इतिहासकार इस पर बल देते हैं कि भारत में भी फ्यूडलिज्म का एक चरण विकसित हुआ था इस आधार पर यह भी उन्होंने गुप्तोत्तर काल का इतिहास लिखा है जिसे प्राचीन से मध्यकाल का निर्धारक काल विभाजन बताया

मार्क्सवादी इतिहास लेखन से प्रभावित होने से यह इतिहासकार हर युग में वर्ग विभाजन एवं वर्गों के बीच संघर्ष की अवस्था दिखाते हैं और कहते हैं कि वर्ग संघर्ष और आर्थिक परिवर्तन के सहयोग से ही युग का परिवर्तन हुआ है कि आर्थिक व्यवस्था जो थी जो चल रही थी 

जैसे कि ऋग्वैदिक काल में अगर बात करें तो पशुपालन थी उत्तर वैदिक काल में आते-आते कृषि प्रधान हो गई इस तरह गुप्त काल और मौर्य काल की बात करें तो अर्थव्यवस्था पर आधारित है तो इन्होंने अर्थव्यवस्था को लेकर काल विभाजन किया उन्होंने बताया है और उनकी यह बात है कि इन्होंने बताया है कि राष्ट्रवादी जो हैं वह दोनों वर्गों में बांटकर देखते हैं और इनका कहने का मतलब है कि अर्थव्यवस्था ही काल विभाजन करती है

हमने इस पोस्ट में चर्चा की कि इतिहास की विचारधाराओं के अलग-अलग मत क्या हैं उसके बारे में किस आधार पर इतिहास लिखा है और पिछली पोस्ट में हमने चर्चा की थी कि इतिहास कैसे लिखा जाता है और उसके कौन-कौन से स्रोत होते हैं उसके बारे में हमने चर्चा की थी अब अगली पोस्ट में हम चर्चा करेंगे कि इतिहास की शुरुआत कैसे हुई कहां से हुई इसके बारे में चर्चा करेंगे तो इस जानकारी के लिए आप जुड़े रहिए द इंडिया डिकोड और पोस्ट आपको अच्छी लगी तो अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और यह बताएं हमें कि क्या राष्ट्रवादी विचारधारा मार्क्सवादी विचारधारा और साम्राज्यवादी विचारधाराओं में क्या समानता नजर आती है अपने मत कमेंट में जरूर बताएं

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