क्या इतिहास पूरी तरह सच होता है? जानिए कैसे रचा जाता है हमारा अतीत।
हमने तो पिछली पोस्ट में यह चर्चा किया है कि जो हमारी प्राचीन सभ्यता थी वह कैसी थी। उदाहरण के तौर पर अपने लिखा तो सिंधु घाटी सभ्यता, वैदिक काल सभ्यता इससे जो भी थे वह हमने देखा है लेकिन कभी इस बारे में हमने नहीं चर्चा किया है कि आखिर इतिहास होती क्या है, इतिहास का मतलब क्या होता है, इतिहास को पढ़ते कैसे हैं, इतिहास पर कैसे बनती है, जो हिस्टोरिकल इतिहासकार का जो मत है वह अलग-अलग कैसे होता है।
इसके
बारे
में
हमने
कभी
चर्चा
ही
नहीं
की
तो
इस
पोस्ट
में
हम
इस
बात
पर
चर्चा
करेंगे
कि
इतिहास
होती
क्या
है,
उसको
कैसे
बनाया
जाता
है,
इतिहास
को
कैसे
लिखी
जाती
है,
कैसे
तर्क
होता
है,
विमर्श
होता
है,
तब
जाकर
हमें
इतिहास
मिलती
है।
इसमें
हम
बारी-बारी
से
चर्चाएं
करेंगे।
आइए जानते हैं इतिहास का मतलब होता है।
इतिहास का मतलब होता है जो बीत चुका है उसको ही इतिहास बोलते हैं। जो भी घटना बीत
चुकी है उसको हम दोहराएं, उसको देखें तो वही हमारा इतिहास क्या है। उसके क्या-क्या स्रोत
हो सकते हैं कि किस आधार पर हम इतिहास को लिखते हैं,
वह किस आधार पर लिखी गई है? सिंधु
घाटी सभ्यता है वह किस पर लिखी है,
वैदिक काल है वह किस पर लिखा है, मौर्य
काल है, मौर्योत्तर काल है,
गुप्त काल है, आधुनिक
काल है? यह किस तथ्य पर आधारित है?
तो आइए हम जानेंगे कि उसको किस-किस आधार
पर परिभाषित किया जाता है, किस-किस बातों पर उस पर चर्चा की जाती है। तो इतिहास को
प्रमुखता से दो रूपों में दर्शाया जाता है जिसके स्रोत हैं - एक है पुरातात्विक
स्रोत और एक है साहित्यिक स्रोत।
पुरातात्विक स्रोत क्या है? पुरातात्विक स्रोत वह स्रोत होता है जो खननों के माध्यम से मिलता है। जो खनन करके मिलता है वह पुरातात्विक स्रोत है। खनन कैसे किया जाता है? जिसे हम भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता मानें तो सिंधु घाटी सभ्यता है जो खनन से हमें मिली है। उसमें जो उस बस्ती मिली है उसको भी परिभाषित करते हैं। उदाहरण के लिए पाषाण काल को लें तो पाषाण काल में क्या होता है? जो भी बस्ती मिली है उसको हम कार्बन डेटिंग के माध्यम से समय का निर्धारण करते हैं कि यह इस समय का है, वह इस समय का है, यह इतने साल पुराना है, कितने साल हो चुके हैं।
लोग कैसे-कैसे हथियार इस्तेमाल कर रहे
थे? उसे करते हैं, क्यों करते हैं? क्योंकि
खनन के माध्यम से वह हमें मिला है। जो भी वस्तुएं इस्तेमाल करते थे, प्रयोग
करते थे उस समय के लोग, वह खनन के माध्यम से मिला है। और जो हमारी सिंधु घाटी सभ्यता
मिली है, इस सभ्यता के लोग ऐसे रहते थे,
इतने साल पुरानी यह सभ्यता थी, तो
यह हो गया पुरातात्विक स्रोत।
साहित्यिक स्रोत की बात करें तो
साहित्यिक स्रोत में क्या होता है?
साहित्यिक स्रोत में होता है जो लिखित
प्रमाण में मिलता है या मतलब किसी भी लिपि में हो,
वह साहित्यिक स्रोत हो जाता है। जैसे हम
बात करें महाभारत की, गीता की, रामायण की, वैदिक
काल के लिए वेदों की, जो भी रचनाएं की गई हैं वह भी पाई जाती हैं। कोई भी लिखित
प्रमाण हो, शिलालेख कहीं बना दिया गया हो तो हम उसको पुरातात्विक स्रोत
बोलेंगे, वह साहित्यिक स्रोत में शामिल हो जाएगा।
अब चर्चा करेंगे कि इतिहास को रचा कैसे जाता है, बनाया कैसे जाता है। ठीक है, तो इतिहास के विभिन्न विषयों की पढ़ाई करने की एक विधा होती है। ठीक है, जो भी विधा है - समाज की, अर्थव्यवस्था की, सामाजिक, सांस्कृतिक, प्रशासनिक जैसे विषयों का अध्ययन होता है।
इतिहास अध्ययन की एक शैली जिसके माध्यम से हम उपरोक्त विषयों के बारे में जानकारी हासिल करते हैं। इतिहास की जानकारी हमें उपलब्ध स्रोतों से मिलती है और उन स्रोतों को उपलब्ध साक्ष्यों का तार्किक व्याख्या होता है। वहां पर क्या होता है कि बड़े-बड़े इतिहासकार जो होते हैं वह आपस में बैठते हैं, उस विषय पर तर्क करते हैं, बातचीत करते हैं, एक दूसरे से तार्किकता होती है, तब जाकर उसको परिभाषित किया जाता है। इतिहासकार का काम होता है इतिहास का आदर्श रूप यह कहता है कि उन साक्ष्यों की तटस्थ व्याख्या करना इतिहासकार का काम होता है।
उसे धर्म, जाति, देश, विचारधारा, पसंद-नापसंद आदि से ऊपर उठकर किसी भी तथ्य की व्याख्या करते हुए अर्थव्यवस्था, सामाजिक, सांस्कृतिक आदि के बारे में अपनी राय बनानी चाहिए। इतिहासकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह तथ्यों के आधार पर इतिहास को उजागर करें ना कि अपनी मान्यताओं से प्रभावित होकर इतिहास लिखें। किंतु यदि हम इतिहास लेखन पर दृष्टि डालें तो किसी भी विषय पर अलग-अलग इतिहासकारों की अलग-अलग राय होती है। एक ही विषय पर अनेक और परस्पर विरोधी मतों के पीछे कारण क्या होता है? स्रोतों की उपलब्धता में अंतर, इतिहासकार के पूर्वाग्रह के कारण।
इतिहासकार के अपेक्षाकृत तथ्यों की आग्रहपूर्ण व्याख्या से भी परस्पर विरोधी मत उभर कर आते हैं। इतिहासकारों के पूर्वाग्रह के पीछे उनका धर्म, उनकी जाति, उनकी भाषा, उनका राष्ट्र, उनकी विचारधारा, पसंद-नापसंद, उनका परिवेश और अनुभव आदि होते हैं। यानी कि इतिहासकार से उम्मीद होती है कि वह तटस्थ रहे परंतु कोई भी इतिहासकार पूर्णतः तटस्थ नहीं होता है। अधिक से अधिक इतिहासकार इतिहास लेखन की बुनियादी व्यवस्थाओं का पालन करते हुए अपने सुनियंत्रित मत ही दे सकते हैं। अगर हम देखें, अपने किसी इतिहासकार पर प्रकाश डालें तो पूर्वाग्रह से मुक्त व्यक्ति आज तक कोई हुआ ही नहीं।
कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर अपनी बात को रखे, ना
ही कभी होगा, यह दावा भी कर सकते हैं। हम अपना वर्तमान जब समझना चाहते हैं
तो वह विभिन्न तत्वों के तर्कों पर आधारित होता है,
एक छवि की तरह होता है और उसका दूसरा
व्यक्ति एक दूसरे की छवि के साथ आ सकता है। इतिहास की भी हमारी साक्ष्य किसी देश, काल, किसी
एक छवि की तरह ही होती है। इस छवि को समझना इतिहास लेखन को समझने का कार्य है।
इसीलिए यह कहा जाता है कि किसी भी विद्यार्थी को इतिहास की एक पुस्तक पढ़ने से
पहले इतिहासकार के बारे में एक पैराग्राफ पढ़ लेना चाहिए। पाठकों को निम्नलिखित
बातों पर ध्यान देना चाहिए।
सामाजिक रूप से इतिहास के निर्माण में
प्रमुख समाज, समाज का इतिहास,
संगठन - प्राचीन काल में पहले तीन तरह
की विचारधाराएं सक्षम थीं जो स्रोत के आधार पर थीं।
हमने जो चर्चाएं की हैं वह इस बात पर
चर्चा की है कि इतिहास को कैसे लिखा जाता है। इसके बारे में हमने उपरोक्त में
चर्चा की है कि यह जो इतिहासकार हैं,
उन्हें इतिहास लिखते समय ना तो अपने
पूर्वाग्रहों को ध्यान देना चाहिए और ना ही अपनी जाति, धर्म
को देखना चाहिए, बल्कि इससे ऊपर उठकर इतिहास को लिखना चाहिए। लेकिन सच्चाई क्या
है कि आज तक ना कोई व्यक्ति पूर्वाग्रह से ऊपर उठा और ना ही कोई व्यक्ति उठ पाएगा।
ऐसा कहा जाता है कि कोई व्यक्ति ऐसा जन्म नहीं लिया है, वह
चाहे अपनी फैमिली को लेकर हो, जाति को लेकर हो, धर्म
को लेकर हो, समाज को लेकर हो,
पार्टी को लेकर हो, जो
भी है वह जरूर पूर्वाग्रह में वह फंस जाता है।
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तटस्थ व्याख्या करनी चाहिए या नहीं करनी चाहिए,
पूर्वाग्रह से ऊपर उठना चाहिए या नहीं
चाहिए।


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