चिकित्सा जगत में भारत की ऐतिहासिक छलांग: एम्स के डॉक्टर ने दिल्ली में बैठकर 13,000 किमी दूर अंटार्कटिका में किया रोबोटिक अल्ट्रासाउंड।
आज की खबर में हम एक बहुत ही बड़ी उपलब्धि के बारे में चर्चा करेंगे जो हमारे विज्ञान तकनीक से जुड़ी हुई है। जी हाँ, आज हम चर्चा करेंगे चिकित्सा जगत की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है जो भारत के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। एम्स दिल्ली के रेडियोलॉजी विभाग की एक बड़ी सफलता हासिल की।
एम्स के प्रोफेसर डॉक्टर चंद्रशेखर ने दिल्ली से बैठकर दुनिया के दूसरे छोर यानी अंटार्कटिका में मौजूद एक मरीज का रियल टाइम अल्ट्रासाउंड किया। जब पहली बार इतनी अधिक दूरी - लगभग अंटार्कटिका हमसे दिल्ली से 13000 किलोमीटर दूर है - इस तरह से दूरस्थ चिकित्सा की जांच सफलतापूर्वक की गई है, यह चौंकाने वाली बात है।
दिल्ली में बैठकर डॉक्टर के पास एक विशेष कंट्रोल डिवाइस होता है। डॉक्टर उस डिवाइस को जैसे-जैसे घूमाता है या उस पर दबाव डालता है, वह जो भी रिएक्ट करता है, जो भी प्रक्रिया देता है, जो भी क्रिया करता है, वह अंटार्कटिका में भी होती है, जिसे हम रोबोटिक आर्म कहते हैं। यह प्रक्रिया जो होती है वह हैप्टिक कंट्रोल डिवाइस कहलाती है।
अंटार्कटिका पर जो मरीज के पास जो भी कंट्रोल होता है, मशीन जो रोबोटिक है - हालांकि जो रोबोट का एक हाथ है जिसे हम रोबोटिक आर्म कहते हैं, जिसमें उसके चारों ओर अल्ट्रासाउंड प्रोब लगा होता है - यह रोबोटिक आर्म दिल्ली से मिल रहे निर्देशों को पालन करते हुए, जैसे दिल्ली में क्रिया दी जाती है, वैसे ही वह रिस्पॉन्स करता है, वैसे ही रिएक्ट करता है, वैसे ही कार्य करता है। वह उसी गति, दबाव से चलता है।
और इसको सफलतापूर्वक बनाने के लिए 5G का महत्वपूर्ण योगदान है क्योंकि हाई स्पीड नेटवर्क के कारण यह सफलतापूर्वक समय पर हो जाता है। क्योंकि अगर 5G इंटरनेट स्पीड, हाई स्पीड नहीं होती तो क्या होता कि यहां पर रिएक्ट कर रहे हैं तो वहां पर 2 सेकंड बाद रिएक्ट करेगा, जिससे कि मरीजों की परेशानियों को समझने में उलझन आ सकती है।
अतः उसको सॉल्व करने के लिए 2 सेकंड, 3 सेकंड का टाइम लग जाता था, जिसकी वजह से यह करना उलझन बन जाती थी, परेशानियां बन जाती थीं। परंतु हाई स्पीड के कारण वह तुरंत रिएक्ट करता है जिससे कि डॉक्टरों को परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता, जिसे हम रियल टाइम डाटा ट्रांसमिशन कहते हैं।
इस तकनीक का महत्व और भविष्य
यह अंटार्कटिका जैसे ठंडे और दुर्गम इलाकों में जहां विशेषज्ञों का पहुंचना नामुमकिन होता है - जैसे कि कभी-कभी यह होता है कि इमरजेंसी हो जाती है तो डॉक्टर वहां तक, दूर-दूर तक नहीं जा पाते हैं।
अभी अगर बात करें गांव की, तो डॉक्टर को पहुंचना थोड़ा सा मुश्किल हो जाता है, सही टाइम पर नहीं पहुंच पाते हैं, जिसकी वजह से मरीज को या तो बहुत सी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं या फिर उनको जान से हाथ धोना पड़ता है। ठीक उसका ही वर्णन कीजिए - बेसिकली अंटार्कटिका पर स्थित इस परीक्षण में सफलता मिली है।
परंतु यह अंटार्कटिका के लिए ही नहीं बनाया गया, उन क्षेत्रों में बनाया गया है जहां तक डॉक्टर को पहुंचना, अलग-अलग जगह पर पहुंचना नामुमकिन है, तो वह इसलिए बनाया गया है क्योंकि डॉक्टर कहीं भी हो, बस वह अपने इस रोबोटिक आर्म के जरिए वह मरीज का इलाज कर सकता है तथा उसको सही तरीके से तथा सही समय पर उस मरीज का इलाज हो जाए तो उनकी जान बच सकती है तथा उनको परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता।
अगर बात करें तो सीमाओं पर जो चौकियां हैं, जो सीमाएं हैं हमारी, और आंतरिक सुरक्षा जो मौजूद है, आंतरिक क्षेत्रों की आपातकालीन स्थितियों में विशेषज्ञ चिकित्सा देने में यह क्रांतिकारी है।
क्योंकि अगर हम बात करते हैं कि सीमा पर जो है हमारी, वहां पर हमारे सोल्जर, सैनिक घायल हो जाते हैं तो उनका इलाज करने के लिए डॉक्टर को पहुंचने में थोड़ा सा टाइम लग सकता है, जिसकी वजह से हमारे सैनिकों को बहुत सारी परेशानियां झेलनी पड़ेंगी तथा वे अपनी जान भी गंवा सकते हैं। लेकिन उसके निवारण के लिए यह है।
ठीक वैसे ही जैसे कि यह हमारे शहरी क्षेत्र के लिए उतना ही लाभदायक है, उससे कई गुना हमारे ग्रामीण क्षेत्र के लिए लाभदायक है। अभी हमने चर्चा किया था कि गांव में क्या होता है कि इमरजेंसी होती है तो वहां पर विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं पहुंच पाते हैं, जिसकी वजह से मरीजों को बहुत सारी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं तथा उनको जान से हाथ धोना पड़ता है, यह तमाम प्रकार की प्रक्रियाएं होती हैं।
परंतु अब नहीं होगा। अब डॉक्टर को पहुंचने या ना पहुंचने से कोई मतलब नहीं है। डॉक्टर चाहे तो वह पहुंच सकता है टाइम पर, तो अच्छी बात है, वरना वह अपनी लैब से ही रोबोटिक आर्म के माध्यम से उन मरीजों का इलाज कर सकता है, जिसकी वजह से मरीजों को सही टाइम पर इलाज मिल जाए तथा वे सही हो जाएं। अगर मरीज को सही टाइम पर इलाज मिल जाता है तो मरीजों के बचने की संभावना बढ़ जाती है।
गांव में क्या होता है कि विशेषज्ञ नहीं मिलते हैं, तो उसी के अनुसार इसके लिए यह रोबोटिक आर्म सुविधा एक वरदान है।
जो उपलब्धि है, यह जो इंस्ट्रूमेंट बनाया गया है रोबोटिक आर्म, यह किसी अकेले एम्स या आईआईटी के दम पर नहीं है, इसमें दोनों का सहयोग है। एम्स का और आईआईटी, दोनों का ही इसमें बहुत बड़ा सहयोग है। दोनों मिलकर एक रोबोटिक आर्म बनाया है जो दुनिया के अंतिम छोर तक पहुंचने में सक्षम है।
यह तकनीक आने वाले समय में दूर का इलाज करने के लिए पूरी तरह सफलतापूर्वक रहेगी। यह दूर का रास्ता तय करने या वहां न जाने की समस्या - यह सब को खत्म करके अपने मरीजों को बचाना, उनकी जो भी क्रियाएं हैं उनको सही करना, यह एक अभूतपूर्व बात है।
एक और उपलब्धि के बारे में जानते हैं जो कैंसर से रिलेटेड है
जिसको क्रायोएब्लेशन कहते हैं। इसमें यह बताया गया है कि बिना बड़े ऑपरेशन किए हुए मरीजों का इलाज करते हैं, वह भी कैंसर का। वह कैसे, तो यह मरीजों के लिए वरदान है। जो बड़े ऑपरेशन नहीं करवा सकते हैं, उनके ट्यूमर वाली जगह पर क्या किया जाता है कि एक पतली सी सुई डाली जाती है।
इस सुई के जरिए ट्यूमर को माइनस 40 डिग्री सेल्सियस से भी कम तापमान पर जमा दिया जाता है। इसमें कैंसर की कोशिकाएं फ्रीज होकर मर जाती हैं। यह तकनीक विशेष रूप से किडनी, लीवर, फेफड़े, प्रोस्टेट के कैंसर के शुरुआती ट्यूमर को खत्म करने में बहुत सफल रही है।
इसमें क्या होता है कि मरीज को अस्पताल में ज्यादा दिन तक नहीं रहना पड़ेगा, उसको जल्दी डिस्चार्ज मिल जाएगा। और जो भी कैंसर का पहले क्या होता था कि कैंसर का ऑपरेशन होता था, जिसमें उनको दर्द का बहुत बड़ा सामना करना पड़ता था, बहुत ज्यादा दर्द होता था और उनको रिकवरी होने में बहुत लंबा समय लग जाता था। परंतु अब इसमें क्या है कि मरीज को ज्यादा देर तक अस्पताल में नहीं रहना पड़ेगा, वे कम समय में डिस्चार्ज हो जाएंगे - हालांकि कुछ दिनों में डिस्चार्ज हो जाएंगे तथा उनको दर्द का सामना कम करना पड़ेगा क्योंकि ऑपरेशन तो हुआ नहीं है, एक छोटी सी सुई डाली गई, जिसकी वजह से उनका दर्द काफी कम हो जाएगा।
कैंसर की शुरुआत और लक्षण
यह है कि जो कैंसर की शुरुआत और लक्षण हैं, उसकी जांच कैसे करते हैं? खासतौर पर हम देख लेते हैं अपने जो लक्षण होते हैं - किन-किन लक्षणों पर हम मान सकते हैं कि कैंसर की शुरुआत हो रही है? इसे डॉक्टर विशेष तौर पर साइलेंट किलर क्यों बोलते हैं? किन संकेतों के मतलब - जो-जो संकेत हैं, इसमें हम बात करेंगे। यह क्या होता है कि यह एक्चुअल में शरीर के किसी भी हिस्से में गांठ होना - अचानक से शरीर में कहीं पर गांठ बन जाती है।
और लंबे समय तक खांसी रहना, जैसे आवाज में भारीपन आ जाना, जिससे कि आवाज बोलने पर भारी-भारी जैसा लगना। इसमें क्या होता है कि अचानक से वजन कम हो जाता है। और वजन कम होने के बाद इसमें थकान क्या होती है - अत्यधिक महसूस होने लगती है, जिससे कि थोड़ी सी दूरी पर चलें तो थकान महसूस होने लगती है, थोड़ा सा भी चलें तो महसूस होती है। तो इस तरह की क्रिया जब होने लगे तो कैंसर का एक संकेत होता है।
मेरी सलाह है कि अगर आप 40 उम्र के बाद हो गए हैं तो आपको नियमित बॉडी चेकअप, मैमोग्राफी या महिलाओं के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट करवाते रहना चाहिए। यह मेरी सलाह है। बाकी आप का स्वास्थ्य आपके हाथ में है।
प्रेरणादायक कहानी
यह हाल ही की एक प्रयागराज की जो घटना है - मनीष कुमार वर्मा की - यह प्रेरणादायक घटना है, इसलिए हम थोड़ा समझाते हैं। उन्होंने क्या किया? उन्होंने केवल खुद कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को मात दी बल्कि वह अन्य मरीजों के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। वजह क्या है? क्यों निभा रहे हैं? उनके पीछे कारण क्या है? इन्होंने क्या किया है, इसलिए हम पर चर्चा करेंगे।
लोगों का कहना है कि कैंसर का मतलब होता है जीवन का अंतिम समय। सही? उनके कहने का मतलब यह है कि अगर कैंसर के लक्षण हैं तो खुद में अपनी हिम्मत रखें। यह मत समझें कि कैंसर हो गया है तो अब इसका इलाज नहीं होगा, हम लोग मर जाएंगे, हम मर जाएंगे। तो यह सब सोचने की जगह यह सोचें कि हम इसको लड़ेंगे, इसके साथ लड़ेंगे, मजबूती के साथ लड़ेंगे, अपने अंदर इच्छा शक्ति को रखेंगे। हम इससे जीतेंगे।
जीवन शैली में बदलाव
आपके जीवन शैली में थोड़ा सा बदलाव लाना चाहिए। वह भी क्या बदलाव हो सकता है? खान-पान में जैसे कि बदलाव लाना चाहिए - जैसे कि जंक फूड और प्रोसेस्ड मीट से बचना, ताजा फल-सब्जियां डाइट में शामिल करना। सलाद - मतलब है कि आप लोग ताजा सब्जी खाएं।
तंबाकू, सिगरेट वगैरा, धूम्रपान, शराब - यह सब से दूरी बनाएं, जिसकी वजह से आपकी लड़ने की शक्ति आ जाएगी, कोशिकाओं को लड़ने में मदद मिलेगी, कोशिकाएं इससे लड़ेंगी। तो आप क्या करेंगे? रोज व्यायाम करेंगे। जो भी शारीरिक क्रिया है, वह करेंगे।
विश्व कैंसर दिवस
आपको लगता होगा कि यह टॉपिक क्यों लिखा गया? तो मैं बता दूं कि आज विश्व कैंसर दिवस है। इसकी उपलब्धि में मैंने यह लिखा, जिसमें विश्व कैंसर दिवस का मुख्य उद्देश्य और संदेश मैंने यह दिया है कि कैंसर से डरें नहीं बल्कि जागरूक बनें। आधुनिक विज्ञान जैसे क्रायोएब्लेशन और समय पर की गई जांच बीमारियों को पूरी तरह ठीक कर सकती है। तो आप चिकित्सा में विश्वास रखें और अपने आप को मजबूत बनाएं और यह न सोचें कि कैंसर हो गया है तो अंतिम दौर है। ऐसा सोचने की जगह आप लड़ने की क्षमता रखें।
एंटीबायोटिक का खतरा - जागरूकता अभियान
इस अभियान में बताया गया है कि जब हम जरूरत ना होने पर भी या गलत मात्रा में एंटीबायोटिक लेते हैं तो शरीर के बैक्टीरिया उन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं।
भविष्य में जब वास्तविक संक्रमण होगा तो वह दवाई असर नहीं करेगी। मतलब यह है कि अगर हम जरूरत ना भी हो तब भी हम क्या करते हैं? दवाइयां लेते हैं। जैसे हल्की सी दर्द हो जाए, एंटीबायोटिक ले लें। जुखाम, बुखार जो नॉर्मल होता रहता है, मेडिकल से दवा लेंगे बिना डॉक्टर की सलाह पर, बिना पर्ची वगैरा के। और क्या करेंगे? थोड़ा सा भी जो मौसम परिवर्तन की वजह से बुखार है, जुखाम होता है, तो हम क्या करते हैं? दवाइयां ले लेते हैं।
और रेगुलर लेते-लेते ऐसी स्थिति आ जाती है कि जब वास्तव में हमें बीमारी हुई है परंतु जब हम वह दवा खाते हैं तो हमारे शरीर पर काम ही नहीं करती है, वास्तविकता में असर ही नहीं करती है। तो इसलिए डॉक्टर की सलाह लें, डॉक्टर से मिलें।
सावधानियां
जो चेतावनी दी गई है - मतलब सरकार द्वारा जो मेडिकल रिपोर्ट्स वगैरह हैं, इनके द्वारा, स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा - उन्होंने कहा है कि मामूली सर्दी, खांसी, जुकाम, सिरदर्द, हल्का बुखार इत्यादि में खुद से एंटीबायोटिक लेना बंद करें। जरूरत हो सकती है तो आप क्या करें कि आप सावधानी बरतें और डॉक्टर की पर्ची पर दवा जो भी हो, उसी की सलाह लें।
इस लेख में हम यह बता रहे हैं कि इस अभियान में यह बताया गया है कि लोगों को अपील की गई है कि लोग जो दवा लें, वह बिना डॉक्टर की सलाह पर न लें। उनके परामर्श पर ही एंटीबायोटिक की सलाह लेकर दवा लें जो पूरी तरह से उनकी सलाह के अनुसार हो।
हम तो कहेंगे कि आप जो भी दवा लेते हैं - एंटीबायोटिक वगैरा - मेडिकल पर जाकर दवा खाते हैं ज्यादा तो उसको कम करें। आप अपने शरीर को स्वस्थ रखें। जब जरूरत हो, आवश्यकता हो तभी लें, तो फिर कोई नुकसान नहीं होगा। वरना इसी वजह से हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो जाएगी क्योंकि इतना हम ज्यादा एंटीबायोटिक दवाई खा चुके होते हैं कि हमारे शरीर में यह दवाएं काम नहीं कर पातीं।
वजह क्या है? जुखाम हो गया, दर्द वगैरह, तो इसमें हम क्या करते हैं कि दवा खाने लगते हैं। और बाद में चलकर जब जरूरत पड़ती है तो यह दवाएं काम ही नहीं करती हैं।
तो मेरी सलाह है कि आप लोग बिना डॉक्टर की सलाह पर, बिना परामर्श पर आप दवा न खाएं। यह आपके लिए लाभदायक होगा। अगर नहीं मानेंगे तो यह हानिकारक हो सकता है। तो आप बताइए कि आपको क्या करना चाहिए? जरूर कमेंट में बताएं। और यह लेख आपको पसंद आया हो तो अपने दोस्तों के साथ शेयर करें।
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