राज्य क्या है? अर्थ, परिभाषा और इसके आवश्यक तत्व

तो हम आज इस पोस्ट में चर्चा करेंगे कि राज्य क्या है ठीक है कैसे हैं इसको भाग समझे ठीक है तो सबसे पहले हम शुरुआत करते हैं कि राज्य क्या है

राज्य क्या है

राज्य का दो अर्थ निकलता है एक अर्थ होता है सामान्य और दूसरा अर्थ होता है जो मूल अर्थ होता है अगर हम सामान्य अर्थ की बात करें तो सामान्य अर्थ में बोला जाता है कि देश का क्षेत्र या कोई प्रांत हो वह राज्य हो जाएगा परंतु हम अगर मूल अर्थ में देखा जाए तो चार तत्व ऐसे बने होते हैं जो राज्य होता है उसमें चार तत्व मिले होते हैं जिसे कौन-कौन से तत्व होते हैं जनसंख्या भूभाग सरकार संप्रभुता यह सब तत्व मिलकर बने होते हैं जिसे हम राज्य कहते हैं

अगर राज्य की अर्थ की बात करें

तो सामान्य रूप से राज्य शब्दों का प्रयोग किसी देश की क्षेत्रीय या प्रांतीय इकाइयों को दर्शाने के लिए किया जाता है जैसे कि भारत में उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश जैसे इसी प्रकार से 28 राज्य हैं
लेकिन वास्तविक अर्थ में राज्य का अर्थ किसी प्रांत विशेष से न होकर किसी समाज समुदाय के राजनीतिक संरचना से होता है अगर जिस भी राज्य में के निर्माण में चार तत्व शामिल नहीं होगा मतलब एक का भी अभाव होगा तो वह राज्य नहीं कहलाएगा जैसे कि हमने बात किया था कि यह राज्य को बनने के लिए क्या-क्या चाहिए तो पहले था हमारा क्या जनसंख्या दूसरा था भूभाग तीसरा था सरकार और
चौथा था संप्रभुता बताइए कि जो तत्व मिलकर बनाएंगे उसी क्षेत्र को राज्य होता है ठीक है हालांकि जिसका निर्माण इन आवश्यक तत्वों से होता है राज्य समाज में कानून व्यवस्था बनाने के लिए मनुष्यों का संगठन का नाम है जिसकी स्थापना के पीछे का मूल उद्देश्य व्यक्तियों की विवादों और मतभेदों को कानून के अनुसार निपटाना होता है
यह जानना पड़ता है कि राज्य एक अमूर्त अवधारणा है अर्थात इस बौद्धिक स्तर पर समझा तो जा सकता है किंतु इसे देखा नहीं जा सकता अगर आमतौर पर बात करें तो राज्य को हम तो कल्पना के आधार पर तो समझ सकते हैं कि हां यह राज्य है लेकिन वास्तविकता में हम इसे देख नहीं सकते सरकार संसद न्यायपालिका नौकरशाही इत्यादि जो संरचना है
यह समूह के रूप में राज्य कहलाता है परंतु वास्तविकता है कि हम इसे देख नहीं सकते किसी भी समाज को विकसित एवं समृद्ध बनाने के लिए एक स्वतंत्र एवं शक्तिशाली राज्य होना अति आवश्यक होता है
राज्यों के तत्व पहले है जनसंख्या वाले लोगों का समूह जो राजनीतिक व्यवस्था के अनुसार संचालित होते हैं इसका मतलब की एक भौगोलिक क्षेत्र है उस पर लोग रहते हैं वह और उसमें राजनीतिक व्यवस्था का राजनीतिक जो व्यवस्था बनाया गया उसके अनुसार क्या करते हो क्रियान्वयन करते हो संचालित रहते हैं भूभाग एक ऐसा निश्चित भौगोलिक प्रदेश जिस पर उस राज्य की सरकार अपनी राजनीतिक क्रियाएं संपन्न करती है यानि कहने का मतलब कि वह भौगोलिक क्षेत्र जिसमें जो राज्य सरकार है
वह अपनी जो भी कल्याणकारी कार्य हो जैसे कानून को लागू करना लोगों पर लोगों की सेवाएं देना लोगों को रोजगार देना यह सब जो क्रियाएं करती है तीसरा आता है सरकार दो या दो से अधिक व्यक्तियों का वर्ग जो व्यावहारिक स्तर पर राजनीतिक शक्ति का प्रयोग करें सरकार राज्य की मूर्त एवं व्यवहारिक अभिव्यक्ति दोनों का मूलभूत अंतर भी हमें देखने को मिलेगा राज्य राज्य में क्या होता है राज्य में चार आवश्यक तत्व होते हैं जनसंख्या भूभाग सरकार संप्रभुता बताइए चारों तत्व मिलकर राज्य का निर्माण करते हैं राज्य मूल शक्ति का धारण करता है राज्य स्थाई होता है और वह हमेशा बना रहता है राज्य अमूर्त तथा अदृश्य होता है सरकार सरकार राज्य का एक भाग है सरकार को शक्तियां राज्य से प्राप्त होती है सरकार अस्थाई होती है और आती जाती रहती है सरकार मूर्त एवं दृश्यमान होती है चौथा तत्व जो संप्रभुता है अपने भूभाग और जनसंख्या की सीमाओं के भीतर कोई भी निर्णय लेने की पूरी शक्ति सरकार के पास हो और किसी भी बाहरी और भीतरी दबाव के बिना निर्णय लेने के लिए बाध्य न हो जो भी निर्धारित करें वह स्वतंत्र अपने मन से स्वतंत्र होकर निर्णय ले हालांकि राज्य के चारों तत्व अनिवार्य है और किसी एक की अनुपस्थिति से राज्य की अवधारणा निरर्थक हो जाती है
मतलब समाप्त हो जाए अनुपस्थिति से राज्य की अवधारणा निरर्थक हो जाती है जैसे की औपनिवेशिक शासन काल में भारतीय भूभाग के सर्वोच्च प्रशासन में वायसराय होता था निश्चित है कि वह भूभाग के भीतर जनता उनके आदेशों का पालन करती थी लेकिन वह संप्रभु नहीं था वह खुद से निर्णय नहीं ले सकता था जबकि वायसराय जो होता था वह किसी गवर्नर जनरल के निर्णय पर चलता था
या फिर ब्रिटिश सरकार के निर्णय का इंतजार करता था तथा उसका आदेश मानने के लिए बाध्य था यानी वह स्वतंत्रता रूप से अपना निर्णय नहीं ले सकता था इसलिए भारत उस समय राज्य नहीं था वर्तमान समय में तिब्बत की निर्वाचित सरकार हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला नामक स्थान से संचालित है
लेकिन जानता है कि उनके पास ना तो अपना भूभाग है और ना ही स्वतंत्र निर्णय लेने की ताकत इसलिए वह राज्य नहीं है हम यहां पर एक मोस्ट इम्पोर्टेंट टॉपिक जो चर्चा करेंगे वह है राष्ट्र और राज्य में अंतर यह बहुत से लोगों के अंदर कंफ्यूजन बैठ जाता है कि राष्ट्र क्या है और राज्य क्या है लोग राष्ट्र अलग बोलते हैं राज्य अलग बोलते हैं हालांकि वास्तव में यह है
क्या उनके दोनों में अंतर क्या-क्या है बहुत से लोगों के मन में यह सवाल बैठ जाता है तो आज हम उनको क्लियर करेंगे कि राष्ट्र और राज्य में क्या अंतर है यह बनते कैसे हैं इन सब के बारे में चर्चा करेंगे तो चलिए पहले समझते हैं राष्ट्र क्या है हालांकि उपरोक्त में तो हमने समझा कि राज्य क्या है कैसे मिलकर बना होता है क्या-क्या उसमें जरूरी तत्व होते हैं जो जब तक जरूरी तत्व होते हैं वह क्या होते हैं यह तो हमने ऊपर उपरोक्त में चर्चा कर लिया था अब हम चर्चा करेंगे कि राष्ट्र क्या है
राष्ट्र होने के लिए देखो क्या होना चाहिए एक भूभाग होना चाहिए उसमें भी संप्रभुता होनी चाहिए जनसंख्या होनी चाहिए और सरकार होनी चाहिए राष्ट्र के अंदर यह भी आना चाहिए
जो राज्य के चारों तत्व है वह राष्ट्र में आना चाहिए परंतु यहां पर एक बात यह देखने को मिलती है कि यहां पर जो संस्कृति की इकाइयां जो संस्कृति है ऐतिहासिक है यह सब कुछ जो लोगों की संस्कृति रिवाज रीति रिवाज खान-पान यह सब जो है वह समान होना चाहिए तो राष्ट्र कहलाता है वरना यह राष्ट्र नहीं कहलाता है हालांकि हम देखते हैं कि जैसे भारत की अगर बात करें भारत में संस्कृतियों सबकी अलग-अलग है जैसे दक्षिण में देखे तो वहां पर संस्कृति अलग है भाषा अलग है खानपान अलग है वहीं अगर उत्तर में देखे तो वहां पर भी रहन-सहन खान सब चीज उनका अलग है वहीं पश्चिमी देखे तो उनका रहन-सहन खान कुछ उत्तर की तरफ मिलता है
परंतु उनका भी अलग है और पूर्व में बात करें तो उनका भी रहन-सहन खान-पान सब स्थिति अलग है संस्कृति वगैरह सब अलग है तो हम इस तौर पर कह सकते हैं कि भारत राष्ट्र नहीं है
राज्य है परंतु एक बात हमें ध्यान देनी होगी कि भारतीय संविधान में भाग चार ख के अनुच्छेद 51 ए में यह राष्ट्रगान राष्ट्रध्वज राष्ट्रीय आंदोलन जैसे शब्दों का राष्ट्र में प्रयोग हुआ यानी कि भारत एक राष्ट्र है संविधान के अनुसार परंतु यहां पर हमको देखने को मिलता है कि राष्ट्र में तो संस्कृति समान होनी चाहिए परंतु राज्य में संस्कृतियां भिन्न हो सकती हैं वहां पर राज्य में संस्कृति अलग हो सकती है
खान-पान अलग हो सकते हैं रहन-सहन सब अलग हो सकता है परंतु भारत में यहां पर उल्टा देखने को मिलता है हमें कि भारत में अलग-अलग प्रकार के जो राष्ट्र है
उसमें अलग-अलग प्रकार के रहन-सहन सब अलग-अलग है परंतु राज्यों के अंदर जाते हैं तो वहां पर हमें खान-पान लगभग सभी राज्यों में सभी अलग-अलग राज्यों के खान-पान रहन-सहन अलग-अलग होते हैं
दक्षिण की बात करें तो केरल जो राज्य है उसमें अपना रहन-सहन खान सब सामान अगर वही उत्तर में बात करें उत्तर प्रदेश को लेकर तो वहां पर भी उत्तर प्रदेश में खान-पान रहन-सहन सब चीज है वह सामान है

राज्य की क्यों आवश्यकता है

अलग-अलग मत है जैसे की मार्क्सवादी के अनुसार विचारधारा जो है मार्क्सवादी विचारधारा के अनुसार वह बोलते हैं कि राज्य की जरुरत नहीं क्योंकि लोग विवेकशील हो गए हैं और वह लोगों के लिए राज्य बनाना एक ऐतिहासिक भूल ही है मार्क्सवादी विचारधारा के जो है
वह कहते हैं परंतु अन्य विचारक जो कहते हैं बोलते हैं कि नहीं राज्य की आवश्यकता है क्यों आवश्यकता है भाई क्योंकि विवेकशील लोग तो है इसमें कोई संदेह नहीं है परंतु कुछ मुद्दों पर उन्हें अंदर लड़ाई झगड़ा हो जाते हैं जो कि हम उसे समझाने के लिए प्रशासन की जरूरत पड़ती है वह स्वार्थ की प्राथमिकता देते हैं बल्कि अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के साथ कुछ भी कर सकते हैं
यही बात पर विचारक चर्चा लेकर अलग-अलग मत जो है वह यह है यह एक दीर्घकालीन विवादास्पद मुद्दा रहा है कि मानव समाज को उचित तरीके से रहने के लिए राजनीतिक व्यवस्था की आवश्यकता है कि नहीं अनेक राजनीतिक विचारक विशेषकर कार्ल मार्क्स तथा अन्य मार्क्सवादी विचारक राजनीतिक व्यवस्था को इतिहास की गलतियों का परिणाम मानते हैं वह मानते हैं कि जो उन्होंने राज्य बनाया है यह एक ऐतिहासिक गलती है यह गलत कर दिया है
राज्य बनाकर यदि सारे मनुष्य समझदार और पारस्परिक विश्वास से काम करें तो राजनीतिक व्यवस्था की जरूरत ही नहीं पड़ेगा उनका कहने का मतलब यह है वहीं दूसरी ओर तरफ अधिकांश विचारकों का मत है कि राज्य का अस्तित्व मनुष्य के लिए आवश्यक है उनके अनुसार मनुष्य कितना भी विवेकशील प्राणी क्यों ना हो वह कभी ना कभी या अक्सर अपने स्वार्थ के अधीन होता है और वह दूसरे स्वार्थ दूसरे व्यक्तियों के साथ अपने टकराव की स्थितियां बनती हैं राज्य का होना सभी मनुष्य को एक निश्चित कानून व्यवस्था की दायरे में ले आता है
ताकि सभी व्यक्ति असुरक्षा की भावनाओं से मुक्त हो जाए एवं सहज जीवन जी सके वर्तमान समय में तो बढ़ती जनसंख्या की अधिकता के कारण राजनीतिक व्यवस्था की भूमिका और भी बढ़ गई है अब यह तो बिल्कुल भी संभव नहीं रहा है कि लोग बिना राज्य या कानून की आपसी सहमति से रह सकती है हालांकि अब हम चर्चा करेंगे कि राज्य के कितने रूप होते हैं कौन-कौन से रूप होते हैं अगर रूप होते तो क्या-क्या है उसमें उसकी चर्चा करेंगे तो पहले है न्यूनतमवादी राज्य यानी कि राज्य में क्या होता है इसमें होता है कि जैसे इसमें पुलिस राज्य कहलाएगा सरकार की जो भावना है
वह नकारात्मक रहेगी उसका अहस्तक्षेप के सिद्धांत पर आधारित रहेगा यानी वह लोगों के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा स्वतंत्रता से पहले यह अस्तित्व में था द्वितीय विश्व युद्ध से पहले भी यह विश्व में था कानून व्यवस्था की स्थापना करके न्यायालय की स्थापना इसे पुलिस राज्य की संज्ञा भी दी जाती है इस सरकार केवल राजस्व के संग्रह कानून व्यवस्था की स्थापना और न्याय प्रशासन के कार्यों को संपन्न करने तक ही सीमित होती है अर्थात ऐसे राज्य में सरकार स्वयं जनता के विकास के लिए आगे नहीं आती है बल्कि ऐसे अवसर निर्मित कर देती है
जहां जनता अपना विकास खुद कर सके और दूसरे शब्दों में न्यूनतमवादी राज्य की अवधारणा अहस्तक्षेप के सिद्धांत पर आधारित होती है द्वितीय विश्व युद्ध के पहले यह अवधारणा प्रचलित रहा और भारत में स्वतंत्रता के पहले यह भी अवधारणा प्रचलित है

लोक कल्याणकारी राज्य का मतलब है कि इसमें जो सरकार होती है जो सकारात्मक भाव से कार्य करती है यह ज्यादा है वह लोगों के बीच अपनाया गया द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसमें यह पर जनता का समावेशी विकास करना सभी क्षेत्रों में विकास के लिए उत्तरदायी होती है
यानी सभी क्षेत्रों में विकास करने के लिए होती है इसमें सरकार जो होती है वह अपना केवल न्यूनतमवादी कार्यों तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि उसके साथ-साथ जनता के समावेशी विकास को सुनिश्चित करने पर बल देती है सबका विकास सभी क्षेत्रों में विकास को सुनिश्चित करने के लिए सरकार को वंचित एवं शोषित वर्ग का विकास करके उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ना होता है
इसका अलावा सामाजिक आर्थिक राजनीतिक आदि क्षेत्रों में विकास को सुनिश्चित करने पर बोल देती है तथा दूसरे शब्दों में लोक कल्याणकारी राज्य में सरकार का हस्तक्षेप अत्यधिक हो जाता है भारतीय संविधान के भाग चार में राज्य के नीति निर्देशक तत्व के अंतर्गत जनता के कल्याण और विकास को सुनिश्चित करने की संबंधित प्रावधान किए गए हैं
लोक कल्याणकारी राज्य में सरकार के कार्य एवं भूमिका बढ़ाने से प्रशासन और अधिकारी तंत्र की भूमिका तथा महत्व में व्यापक वृद्धि हो जाती है और अधिकारी तांत्रिक राज्य जैसी संकल्पनाओं का भी उदय होता है हालांकि हम लोग अगले पोस्ट में बात करेंगे कि कौन से राज्य का निर्माण हुआ कौन से राज्य कहां गए किस राज्य का निर्माण हुआ जो राष्ट्र का गठन हुआ कि संविधान सभा में जो राज्यों का पुनर्गठन हुआ वह कैसे इस पर हम अगले पोस्ट में जुड़े रहिए आप हमारे ब्लॉग से और पढ़ते रहिए और अपने दोस्तों के साथ शेयर करते रहिए और आपसे क्वेश्चन है आप बताएं कि कौन से राज्य जनता के लिए लाभदायक है न्यूनतमवादी राज्य या लोक कल्याणकारी राज्य

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