सैंधव घाटी सभ्यता (सिंधु घाटी सभ्यता)
हड़प्पा की अवधि के तीन चरण हैं:
प्राक् हड़प्पा: (3300 ई.पू. से 2600 ई.पू.)
प्राक् हड़प्पा: यह पाकिस्तान के बलूचिस्तान और सिंधु क्षेत्र से होते हुए भारत के राजस्थान और हरियाणा राज्यों तक फैला था। इसके अवशेषों से यह सिद्ध होता है कि यह इतने बड़े क्षेत्र में विस्तृत था।
परिपक्व हड़प्पा: (2600 ई.पू. से 1900 ई.पू.)
परिपक्व हड़प्पा: इसके अवशेष पाकिस्तान के बलूचिस्तान और सिंधु क्षेत्र से होते हुए भारत के राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, जम्मू और उत्तर प्रदेश राज्यों तक मिले हैं। इससे सिद्ध होता है कि यह इन क्षेत्रों तक फैला था।
उत्तर हड़प्पा: (1900 ई.पू. से 1300 ई.पू.)
उत्तर हड़प्पा: यह क्षेत्र मुख्य रूप से रंगपुर और रोजदी तक फैला था।यहाँ पर विभिन्न प्रकार की प्रजातियां रहती थीं, जिनमें से प्रमुख भूमध्यसागरीय (Mediterranean) प्रजाति थी।
सर्वाधिक जनसंख्या इसी प्रजाति से संबंधित थी।
इसके अलावा यहाँ प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड (Proto-Australoid), अल्पाइन (Alpine) और मंगोलॉयड (Mongoloid) प्रजातियां भी निवास करती थीं।
हड़प्पा की नगर नियोजन, जल निकासी और धार्मिक विशेषताएँ
नगर नियोजन और जल निकासी: इसमें देखने को नालियां मिली हैं, जिसकी बनावट ऐसी है कि वे नालियां पक्की ईंटों से बनी थीं। उसके अंदर बालू के भी अवशेष मिले हैं, जो इस बात पर जोर देते हैं कि उस समय नालियों को नीचे से पॉलिश किया गया था।
साथ ही यह भी देखने को मिलता है कि वे नालियां ढकी हुई थीं, जिससे यह ज्ञात होता है कि उस समय लोग स्वच्छता का काफी ध्यान रखते थे।
सड़कों का निर्माण: वहाँ पर सड़कों का निर्माण देखने को मिलता है, जिनमें सर्वाधिक संख्या में कच्ची सड़कें देखने को मिलती हैं तथा पक्की सड़कें भी देखी गई हैं।
ये कच्ची सड़कें ईंटों को तोड़-तोड़ कर उनके टुकड़ों से बनाई गई थीं और पक्की सड़कों का निर्माण पक्की ईंटों से किया गया था। ये सड़कें एक-दूसरे को समकोण (90 degree) पर काटती थीं।
स्नानागार (Great Bath): चौकाने वाली बात यह भी है कि उस समय में स्नानागार भी था। लोग स्नानागार को पवित्रता से प्रयोग करते थे।
उसकी बनावट ऐसी थी जिसमें लोग दोनों तरफ से नीचे उतरते थे; इसके लिए दो सीढ़ियाँ उत्तर और दक्षिण की दिशा में बनाई गई थीं। पानी के किनारों पर पटरी की तरह बनाई गई है जिस पर लोग चल सकते थे।
भवन की बनावट: घरों की बनावट ऐसी थी कि घर की खिड़की मुख्य सड़क पर न खुलकर गलियों में खुलती थी। खिड़कियाँ हवा तथा धूप को ध्यान में रखकर बनाई गई थीं।
घर बहुमंजिला होते थे क्योंकि इनमें सीढ़ियाँ बनाई गई थीं। घरों के बीच आँगन भी देखने को मिला है। अगर दुर्ग (Citadel) की बात करें तो यह दो भागों में बँटा हुआ था—एक उच्च स्थल पर और एक निम्न स्थल पर। उच्च स्थल पर पुरोहित, शासक और बड़े व्यापारी लोग रहते थे।
वहाँ अन्नागार बनाया गया था जिसमें बहुत सारा अनाज रखा जाता था। जब बाढ़ आती थी, तब इसका प्रयोग सभी लोगों के लिए किया जाता था। एक दुर्ग (निचला शहर) आम आदमी के लिए बनाया गया था। जब बाढ़ आती थी, तो आम आदमी ऊपर यानी उच्च स्थल पर चले जाते थे जहाँ पुरोहित और शासक रहते थे।
धार्मिक विशेषता: यहाँ के लोग सैंधव धर्म को मानते थे। इनके धर्म का स्वरूप निम्नवत था: ये बहुदेववादी थे यानी ये एक देवता को नहीं बल्कि बहुत सारे देवताओं की पूजा करते थे।
ये उपयोगितावादी थे और इस समय भक्ति उपस्थित थी। ये इहलौकिक के साथ-साथ पारलौकिक को मानते थे, परन्तु ज्यादा इहलौकिक को मानते थे। ये मूर्ति पूजा करते थे और छोटी-छोटी मातृ-मूर्तियों का निर्माण कर उनकी पूजा करते थे, जिससे यह ज्ञात होता है कि समाज मातृसत्तात्मक था।
इनका उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति नहीं, बल्कि धन और संतान की प्राप्ति था। यहाँ धर्म की उपस्थिति थी परन्तु वर्चस्व कम था। ये मातृ-देवियों के साथ-साथ पुरुष देवताओं की भी पूजा करते थे और जल तथा सूर्य की उपासना भी करते थे। ये लिंग और योनि की भी पूजा करते थे।
ये ताबीजों का प्रयोग करते थे और अंधविश्वास के साथ-साथ शैतानी शक्तियों में भी विश्वास करते थे। ये पुनर्जन्म में भी विश्वास करते थे।
हड़प्पा की शवाधान (अंतिम संस्कार) पद्धति
यहाँ पर शवाधान पद्धति भी देखी गई है, जो निम्नलिखित है:
पूर्ण शवाधान: इसमें व्यक्ति के शव को पूरी तरह से (मिट्टी में) दफना दिया जाता था।
आंशिक शवाधान: इसमें व्यक्ति को मरने के बाद (खुले में) ऐसे ही छोड़ दिया जाता था ताकि कोई जंगली जानवर या पक्षी आए और उसे खा ले। उसके बाद बचे हुए अवशेषों को मिट्टी के बर्तन में रखकर दफना दिया जाता था।
दाह संस्कार: इसमें व्यक्ति को मृत्यु के पश्चात जला दिया जाता था।
यहाँ पर ताबूत भी देखने को मिले हैं। ऐसा माना जाता है कि यहाँ किसी विदेशी व्यक्ति को दफनाया गया होगा। यहाँ शव के साथ उस मृत व्यक्ति की प्रिय वस्तुओं को भी दफना दिया जाता था। इसके पीछे यह अवधारणा थी कि व्यक्ति मृत्यु के बाद ऊपर (परलोक) जाकर इन वस्तुओं का प्रयोग करेगा।
अधिकांश शवों को उत्तर-दक्षिण दिशा में लिटाकर दफनाया जाता था।
आर्थिक स्थिति- अगर आर्थिक स्थिति की बात करें तो निम्नलिखित बातें आती हैं:
कृषि- इन लोगों को नौ फसलों का ज्ञान था जिसमें से प्रमुख फसल गेहूं तथा जौ थी लेकिन यहाँ पर कपास का भी साक्ष्य मिलता है। यूनानियों द्वारा इसे सिंडन नाम दिया गया। यहाँ पर नहरों के साक्ष्य मिले हैं जो अफगानिस्तान के शोर्टुघई में हैं परन्तु सिंचाई का कोई व्यापक साक्ष्य नहीं मिला है।
उद्योग- ये लोग मृदभांड का उद्योग करते थे। ये लोग सीप का भी उद्योग करते थे इसका साक्ष्य लोथल और बालाकोट से मिला है। ईंट का उद्योग करते थे, ये लोग वस्त्र का उद्योग करते थे। ये लोग धातुकर्म का भी उद्योग करते थे जैसे कांसे का। मनके का भी उद्योग करते थे जिसका साक्ष्य लोथल और चन्हूदड़ो में मिला है।
व्यापार- ये लोग विदेशों से व्यापार भी करते थे जैसे मध्य एशिया, ईरान, मिस्र, ओमान, बहरीन द्वीप, मेसोपोटामिया। ये ज्यादातर व्यापार मेसोपोटामिया से करते थे। सारगोन काल में सर्वाधिक व्यापार होता था।
बंदरगाह- सैंधव काल के निम्नलिखित बंदरगाह हैं: लोथल - भोगवा नदी सुत्कागेडोर - दाश्क बालाकोट - विदार नदी अल्लाहदीनो - सिंधु और अरब सागर कुन्तासी - फुलकी
निर्यात की वस्तुएं- वस्त्र, मनके, मोर पक्षी, तांबा, हाथीदांत, मृदभांड, कीमती लकड़ियां।
आयात की वस्तुएं- लाजवर्द मणि, सीसा, सोना, चांदी, टिन, फिरोजा, मोती।
ये लोग विनिमय के माध्यम से व्यापार करते थे। इसमें व्यापार में लेन-देन के लिए मुहरों का प्रयोग किया जाता था। ये मुहरें ज्यादातर वर्गाकार ही देखने को मिली हैं और इन मुहरों के निर्माण में सेलखड़ी का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है। इन मुहरों में एक मुहर मिली है जिस पर पशुपति का अंकन है, इसे मार्शल ने 'आद्य शिव' कहा है। इस पर बाघ, हाथी, भैंसा, गैंडा और हिरण हैं (इसमें दो हिरण मिले हैं)। लेकिन सबसे ज्यादा मात्रा में 'एकश्रृंगी पशु' मिला है।
यहाँ पर नृत्य करती हुई कांस्य की मूर्ति मिली है, जो कांस्य की मूर्ति बनी है वह 'लुप्त मोम विधि' (Lost Wax Method) पर बनी है।

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