उत्तर वैदिक काल (1000-600 BC): सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन का विस्तृत विवरण
पिछली पोस्ट में हमने यह देखा था कि वैदिक काल क्या होती है और ऋग्वैदिक काल क्या होती है। उसमें हमने चर्चाएं विभिन्न प्रकार से की थीं, जिसमें वैदिक काल में अर्थव्यवस्था, सामाजिक और राजनीतिक यह सब व्यवस्थाओं पर मैं चर्चा किया था। हालांकि, उसमें यह भी कहा गया था कि यज्ञ क्या है, इसमें भी चर्चा की गई थी, वेद कितने प्रकार के हैं, साहित्यिक पर भी चर्चा कर लिया गया था। इसमें क्या प्रक्रिया हो रही थी यह भी चर्चा कर लिया गया था।
अब इस पोस्ट में हम चर्चा करेंगे उत्तर वैदिक काल के बारे में। उत्तर वैदिक काल क्या है, इसकी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और जितनी भी प्रकार की व्यवस्थाएं थीं, उससे हम चर्चा करेंगे। इस पर महिलाओं की व्यवस्था कहाँ थी, राजाओं की व्यवस्था क्या थी, यात्रा क्या थे, महिलाओं की अवस्था क्या थी, सामाजिक समानता क्या थी—यह विभिन्न प्रकार के जो मुद्दे हैं इस टॉपिक में हम खत्म करेंगे। यानी इस पोस्ट में जितने भी वैदिक काल से जुड़े विषय होंगे, सब को हम एक बार समाप्त करेंगे।
हालांकि इसमें एक और भी टॉपिक है, जिसे किसी टॉपिक में हम करेंगे, वह है लोहा, जो कि वैदिक काल के महत्वपूर्ण युग में माना जाता है। वैदिक काल के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण टॉपिक है। इसमें वैदिक कार्य, सामाजिक अवसर, बहुत सारी क्रांतियाँ आती हैं, जैसे कि कृषि क्रांति, जिसे कई गुना अधिक प्रभावी माना गया। इसे हम एक-एक करके चर्चा करेंगे।
धर्म और उपासना
अगर वैदिक काल के स्वरूप की बात करें तो धर्म का स्वरूप जटिल एवं व्यापक था। यहाँ पर लौकिकता के साथ-साथ अन्य पहलुओं पर भी आधारित था। पूजा नहीं थी, लेकिन भक्ति का भी अभाव था। इसमें मूर्ति पूजा का भी समावेश नहीं था। उपासना का उद्देश्य और पद्धति क्या थी, इस पर चर्चा करते हैं।
उद्देश्य में देखा जाए तो यह लोग लौकिकता के साथ-साथ त्रिलोकी और मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयासरत थे। उनके मुख्य उद्देश्य अत्यधिक नहीं थे। उत्तर वैदिक काल में पूर्व वैदिक धर्म की भांति लौकिक उद्देश्य प्रमुख थे।
उपासना पद्धति की बात करें तो यहाँ भी व्यक्ति एवं सामूहिक रूप से लोग समूह में स्तुति करते थे। मंत्रों के उच्चारण और शुद्धता पर ध्यान दिया गया। यह धारणा प्रचलित थी कि अशुद्ध मंत्र उच्चारण से अनिष्ट की संभावना होती है। मूर्ति पूजा नहीं थी। बड़े-बड़े यज्ञों में पशु बलि भी दी जाती थी। धर्म में हिंसा का समावेश भी हुआ है।
पुरोहितों का कार्य
पूर्व वैदिक काल की भांति, यहाँ पर पुरोहितों की संख्या अनुष्ठानों में वृद्धि के कारण अधिक हो गई थी। ऋग्वैदिक काल में ऐसा नहीं था। दासियों की संख्या भी अधिक थी, क्योंकि उनका कार्य घरेलू कार्यों में लगाया जाता था। भारतीय महिलाओं की अधिकांश संख्या घरेलू कार्यों में व्यस्त थी।
विष्णु आदि देवताओं का महत्व बढ़ गया। कुछ देवताओं का संबंध किसी विशेष वर्ग से हुआ, जैसे पोषण सूत्रों के देवता। सामाजिक वर्गीकरण भी हुआ। सहायक देवी-देवताओं का वर्गीकरण, जैसे कुबेर, गंधर्व, दिगपाल आदि किया गया।
उत्तर वैदिक काल की सामाजिक स्थिति
उत्तर वैदिक काल लगभग 1000 से 600 ईसा पूर्व तक चला। सामाजिक स्थिति जटिल और भौतिकवाद से प्रेरित थी। समष्टानीय वर्ग से बाहर जाकर व्यवसाय करना वर्जित था। परिवार की स्थिति लगभग ऋग्वैदिक काल के जैसी थी। वहाँ परिवारों की संख्या को कुलपति कहा जाता था। मुख्य परिवारों के लिए संयुक्त परिवार का प्रचलन था।
महिलाओं की स्थिति दैनिक जीवन में लगभग सभी आधारों से समान अधिकार था। सभा में, विद्या में, शिक्षा, उपनयन संस्कार, विधवा पुनर्विवाह, यज्ञ में भाग लेने आदि में महिलाओं को अब वंचित कर दिया गया। बाल विवाह का प्रारंभ देखने को मिला। साहित्य में भी महिलाओं की असमानता पर ध्यान दिया गया। ब्राह्मण साहित्य में महिलाओं को दुखों का कारण बताया गया।
मैत्रिणी साहित्य में भाषा और सुर से स्त्रियों की तुलना की गई। प्रमुख विद्युत सम्मेलन में मैत्री, गार्गी, शुक्ला, कल्याणी का उल्लेख मिलता है। अंतरजातीय विवाह पर बाल विवाह का प्रचलन था। आयुर्वेदिक काल में महिलाओं और पुरुषों की शिक्षा थी, लेकिन उत्तर वैदिक काल में शिक्षा से वर्जित कर दिया गया।
आश्रम व्यवस्था
उत्तर वैदिक काल में चार आश्रम व्यवस्था का विकास हुआ। सर्वप्रथम उपनिषद में चारों आश्रम का वर्णन मिलता है: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वनस्पति, सन्यास।
लोहे की भूमिका
लोहे की भूमिका महत्वपूर्ण थी। इसका उपयोग उपकरण बनाना, कृषि उपकरण बनाने में किया गया। लोहे का सर्वाधिक उपयोग युद्ध में हुआ। कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई क्योंकि लोहे के प्रयोग से कृषि उपकरण विकसित हुए। राजा द्वारा अधिक कर और सामाजिक संरचना में लोहे की भूमिका महत्वपूर्ण रही।
अर्थव्यवस्था
लोहे के उपकरणों के उपयोग से स्थायी जीवन की शुरुआत हुई और कृषि का विकास संभव हुआ। स्थायी जीवन व्यतीत होने से कृषि का विकास हुआ। ऋग्वैदिक काल में स्थायी जीवन नहीं था। पशुपालन और कृषि समुदायों का विकास हुआ। लोहे का उपयोग युद्ध और कृषि उपकरण में हुआ। व्यापार में अनाज मापने के यंत्रों का उपयोग हुआ।
राजनीतिक व्यवस्था
उत्तर वैदिक काल में कबीले या जन्म मिलकर बड़े जनपद का निर्माण करते थे। लगभग 600 ईसा पूर्व महाजनपदों में राजा की शक्ति बढ़ी। राजा की तुलना देवताओं से होने लगी। चक्रवर्ती सम्राट की अवधारणा विकसित हुई। राजा का पद वंशानुगत हो गया। मंत्रिपरिषद और प्रजा सभा का विकास हुआ। प्रजातांत्रिक संस्थाओं की पर्याप्त कमी थी। राजस्व में वृद्धि और युद्ध उपकरणों के निर्माण के कारण सैनिक संगठन भी बढ़ा।
निष्कर्ष (Conclusion): तो दोस्तों, आज हमने देखा कि कैसे उत्तर वैदिक काल में लोहे की खोज ने न सिर्फ खेती बल्कि पूरे समाज और राजनीति को बदल कर रख दिया। जहाँ एक तरफ जनपद और बड़े राज्यों का उदय हुआ, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक बुराइयां और महिलाओं की स्थिति में गिरावट भी देखने को मिली। UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिहाज से यह टॉपिक बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहीं से महाजनपद काल की नींव पड़ी थी।
उम्मीद है आपको यह जानकारी पसंद आई होगी। अगर आपका कोई सवाल है या आप किसी खास टॉपिक पर अगला पोस्ट चाहते हैं, तो नीचे कमेंट में जरूर बताएं।
अगली पोस्ट में हम चर्चा करेंगे: 'महाजनपद काल और 16 महाजनपदों का उदय'| हमसे जुड़े रहें!


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